‘एक’ बूँद कम ही हूँ।

Emptiness

                 Nothing soothes now !

सतह पर आकर रूकती हूँ,

किनारों पर ही अक्सर  थकती  हूँ।
बैठती हूँ, सोचती हूँ,
खुद से बातें करती हूँ ,
उठ कर चल देती हूँ ,
गुंझिल पठारों की ओर ,
सागर के प्रतिबिम्ब में ,
संवादों को सुलझाया करतीं हूँ,
उदास प्रश्नो की पत्रिका हाथों में उठाये ,
यही , इसी मनस पटल पर आ जाती हूँ,
समय बिताया करतीं हूँ ,
यथार्थ और संवाद से परे,
थकन और तेरी ‘याद’ से परे।
यही विशेषता हैं ,
संतुलित हूँ ,
थकी हूँ,
रुकी हूँ,
थमी नहीं हूँ ,
मैं सागर की अथाह नमी हूँ,
फिर भी ‘एक’ बूँद  कम ही हूँ।
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