मन भावुक है , चाहता है बैठना , सर को पकड़ के हाथ में ……

मन भावुक हैं , चाहता है बैठना , सर को पकड़ के हाथ में ,

चूल्हे पे सेंकी गयी रोटियों को मूक बैठ कर खाते हुए।
बस यूँही , आँखों में आते धुएं को उड़ाते हुए ,
गुनगुनाते हुए , क़दमों को बस बढ़ाते हुए ,
साँचे में विचारों की चाय उड़ेले , सींप की सीगरी सुलगाये हुए
मद्धम सी आंच है , मीठी सी भांप हैं।
और पर ये बैठा चुप चाप है।
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