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मेरे साथ हो गयी है तेरी ख़ास मेहरबानी…

कभी ज़िन्दगी में ,एक आसान सी किश्त सोचती हूँ , कि चुका डालूँ , कोई बोझ है , अनकहा है , मार रहा है मुझे। सोचती हूँ , सोच से ऊपर उठ जाऊं। या यूँ ही बिखर जाऊं। ज़ाहिर है, कुछ साफ़ और स्पष्ट नहीं है अभी। And I too don't know.

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कवि मन संवेदना

मैं कवि मन संवेदना को जीना जानती हूँ स्वभाव सा है , विचारों की श्रृंखला का संकलन करती रहती हूँ। और फिर बैठ कर , जब समीक्षा करती हूँ , अपने सान्निध्य में मौन बैठ कर ही खुद की प्रतीक्षा करती हूँ। कई कई बार , मैं भीड़ में , खुद को भीड़ पाती हूँ ,… Continue reading कवि मन संवेदना